नई शिक्षा निति की सार्थकता एवं दुष्प्रभाव

सरकार नई शिक्षा नीति NEP (New Education Policy) लेकर आयी है। इसके तहत प्राथमिक से 12वीं तक की शिक्षा का एकीकरण (Universalization) किया जायेगा अर्थात समान शिक्षा । शिक्षा क्षेत्र में सुधारों की आवश्यकता तो है लेकिन क्या ये कदम सही दिशा में है ? सिर्फ कोर्स बदलने से मोदी जी के “access, equity, quality, affordability and accountability” मिशन की प्राप्ति हो जाएगी क्या ?

अकेले यूपी में करीब 3, 00, 000 शिक्षकों के पद रिक्त हैं । योगी सरकार आने के पश्चात करीब 1 लाख प्रधानाध्यापकों के पद खत्म कर दिए गए । जबकि नयी 69000 शिक्षक भर्ती घोटालों के चलते पूर्ण नहीं हो पा रही। पूरे भारत का हाल लगभग यही है। अधिकाशत: सरकारी स्कूलों की हालत ये है कि एक ही शिक्षक कई कक्षाओं को पढ़ा रहे है । स्कूल में बिजली, पानी, शौचालय नहीं है । खुले में शौच जाने के कारण विशेष तौर पे लड़कियां स्कूल जाने से बचती हैं ।

उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा मंत्री सतीश द्विवेदी के गृह क्षेत्र सिद्धार्थ नगर के सरकारी स्कूल में शौचालय नहीं हैं । बारिश में पानी टपकता है, स्कूल की बाउंड्री तक नहीं है। यह हाल पीएम मोदी जी द्वारा 11 करोड़ टॉयलेट बनवा के खुले में शौच मुक्त भारत की घोषणा करने के बाद का भी है। ऐसे में सिलेबस बदल देने या विषय वस्तु में से राष्ट्रीयता, नागरिकता के पड़ता हटा देने से देश की शिक्षा कैसे बदल जायेगी ? आधारभूत ढांचा बनाने की जरुरत है उसे छोड़ कर पाठ्यक्रम में बदलाव करना बिलकुल वैसा है जैसा नोटबंदी से आतंकवाद या ब्लेक मनी रोकना… यह महज एक छलावा है।

दूसरा, मोदी जी NEP में एक तरफ Equality की बात करते हैं और दूसरी तरफ कुछ विशेष लड़को को उन्ही की सरकार के मंत्रियों के लिखित पत्रों से दण्डित कर आत्महत्या के लिए मजबूर किया गया। उस मामले में आज तक किसी को दण्डित नहीं किया गया। बंडारू दत्तात्रेय से लेकर स्मृति ईरानी तक पर कोई आंच नहीं आयी। ऐसे में समानता की बात एक झूठ नज़र आती है।

नयीनीति के दुष्प्रभाव :

नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लिए RSS, भाजपा शासित राज्यों के शिक्षा मंत्री और ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष के. कस्तूरीरंगन की कई मीटिंग्स हुईं। संघ के सह संगठन “अखिल भारतीय इतिहास संयोजक योजना” के संगठन मंत्री बालमुकुंद पाण्डेय कहते हैँ कि उनकी 80% मांगों को कमेटी ने मान लिया है। अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के संगठन मंत्री महेन्द्र कपूर भी इस पॉलिसी के बनाने में सम्मिलित थे।

फिलहाल राज्यों के अपने शिक्षा बोर्ड हैँ जैसे यूपी बोर्ड, बिहार बोर्ड जो केंद्रीय बोर्ड CBSE के अतिरिक्त हैँ। ई का पाठ्यक्रम बनाने, बदलने इत्यादि का अधिकार इन्ही राज्यों के पास है। केंद्रीय बोर्ड में नियुक्तियां केंद्र सरकार करती है और पाठ्यक्रम में सीधा केंद्र सरकार का हस्तक्षेप होता है।

CBSE ने अपने 11वीं कक्षा के पाठ्यक्रम से नागरिकता, राष्ट्रीयता, धर्म निरपेक्षता हटा दी। ये एक तरह से मोदी सरकार द्वारा देश की अगली पीढ़ी को कट्टरता की तरफ ले जाने का कदम है जिसमें उन्हें पता भी नहीं चलेगा। 2019 में दिल्ली यूनिवर्सिटी ने (केंद्र के दबाव में) गुजरात दंगों को पढ़ाई से हटा दिया। लेकिन राज्यों के अंडर आने वाले यूनिवर्सिटी या बोर्ड्स पर इस तरह का दबाव अभी संभव नहीं होता है।

पूरे देश का पाठ्यक्रम एक करने के सहारे केंद्र सरकार राज्यों की शक्ति को ख़त्म कर रही है। अगर गुजरात सरकार कक्षा -3 में मोदी के मगरमच्छ पकड़ने की कहानी पढ़ाती है तो जरुरी नहीं राजस्थान सरकार भी पढ़ाये। लेकिन इस पॉलिसी के लागू होने के बाद केंद्र सरकार एक पाठ्यक्रम निर्धारित कर देगी और हर राज्य को उसे ही मानना होगा।

देश की शिक्षा समान होनी चाहिए लेकिन राज्यों के अधिकार इस बाबत सुरक्षित रहने चाहिए। भारत में कुल 780 भाषाएँ बोली जाती हैँ जिसमें से 22 आधिकारिक भाषाएँ हैँ। ऐसे देश में राज्यों को अपनी भौगोलिक व सांस्कृतिक विरासत को जिन्दा रखने की जिम्मेदारी और अधिकार आनिवार्य हैँ।

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